1.क्या है विहंगम योग?
सेवा सत्संग और साधना की त्रिवेणी है | ज्ञान का वास्तविक स्वरुप है | ज्ञान का चेतन स्वरुप है | यह भक्ति की चेतन युक्ति है,ये भक्ति का चेतन मार्ग है |एक परिभाषा नहीं है,अनन्त- अनन्त परिभाषाएँ हैं ,यह हमारी भारत की प्राचिनत...See more
2.ब्रह्यविद्या का जो वाह्य तत्त्वज्ञान है वह छ: प्रकार के नित्य अनादि सताओं का बोध कराता है | एक जो सत्ता है वह ईश्वर की है जो सकल स्कम्भ है | एक सत्ता अक्षर ब्रह्य की है जिससे सृष्टि चलायमान है, एक बद्ध-मुत्त्क आत्मा है जो कभी शरीर में आबद्ध होती हो जाती है | एक मुक्ति प्रदान करने वाली सत्ता Sadguru की है, जो सत्ता जन्म-मरण ले चक्र से छुड़ाने वाली है, ये चार चेतन सत्ताएँ हैं |एक सत्ता काल की भी है, जो जड़-चेतन से रहित है, जिसके द्वारा हमें समय-काल का बोध होता है | एक प्रकृति है जड़ है, परिणामी है, परिवर्तनशील है |
जब स्वर्वेद का प्रकाशन नहीं हुआ था, तब सद्गुरुदेव इसकी पाण्डुलिपि को सदैव अपने पास रखते थे और भक्त-शिष्यों के मध्य स्वयं इसका गम्भीर स्वर में पाठ किया करते थे |यह ग्रन्थ उनके हृदय का प्रकाश है |स्वर्वेद का विषय अध्यात्म विद्या है, योगविद्या है और साथ ही साथ मानव जीवन के लिए समस्त पक्ष इसमें निहित है |यह अद्वितीय महान् सद् ग्रन्थ है |इसी के आधार पर हमें विहंगम योग के रथ को आगे बढ़ाना है |
योग की जो भूमि है वह आध्यात्मिक है, उसका जो आधार है वह आत्मिक है| विहंगम योग के प्रणेता अनन्त श्री सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज ने योग के उसी महान विज्ञान को प्रतिपादित किया, अपनी कठिन तपश्चर्या के बाद योग के सारे रहस्यों को अनावृत किया | हम इसे जानने का अवस्य प्रयत्न करें, योग की गहराइयों में उतरने का प्रयत्न करें| विहंगम योग के प्रमुख अध्यात्मिक सद्ग्रन्थ 'स्वर्वेद' के माध्यम से हम इसका तत्वज्ञान प्राप्त करें और केवल बौद्धिक ज्ञान ही प्राप्त न करें, उसकी क्रियात्मक साधना की तरफ भी बढ़ सकें| यह हमारा प्रयास होना चाहिए!
योग की जो भूमि है वह आध्यात्मिक है, उसका जो आधार है वह आत्मिक है| विहंगम योग के प्रणेता अनन्त श्री सद्गुरु सदाफल देव जी महाराज ने योग के उसी महान विज्ञान को प्रतिपादित किया, अपनी कठिन तपश्चर्या के बाद योग के सारे रहस्यों को अनावृत किया | हम इसे जानने का अवस्य प्रयत्न करें, योग की गहराइयों में उतरने का प्रयत्न करें| विहंगम योग के प्रमुख अध्यात्मिक सद्ग्रन्थ 'स्वर्वेद' के माध्यम से हम इसका तत्वज्ञान प्राप्त करें और केवल बौद्धिक ज्ञान ही प्राप्त न करें, उसकी क्रियात्मक साधना की तरफ भी बढ़ सकें| यह हमारा प्रयास होना चाहिए!
योग में स्थित होकर कर्म करो। जिससे कर्म की सिद्धि और असिद्धि में समान विचार रहे। ऐसा न कि कर्म करने के पश्चात् उनके अच्छे या बुरे फल प्राप्त होने से अथवा सफल या असफल होने के हर्ष या विषाद से चित्त में चंचलता हो, या कर्म के फल की प्राप्ति में विलम्ब देख कर उन्हें असिद्ध अर्थात् फलीभूत न होना समझ कर चित्त में उद्विग्नता हो, अतः इन दोनों परिस्थितियों में स्थिर चित्त रहना, योग में स्थित होकर कर्म से ही सम्भव है |
विहंगम योग के माध्यम से जो भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्व हैं, उसका प्रचार- प्रसार करना है | परोपकार का, दया का,क्षमा का, जो भी नैतिक गुण हैं, जो भी शुभ-गुण हैं, जो सात्त्विक गुण हैं, उनका प्रचार-प्रसार ब्रह्मविद्या विहंगम योग के माध्यम से तीव्र गति से करने की आवश्यकता है |
प्रत्येक योग साधक के लिए यह अनिवार्य है कि ध्यान करने से पूर्व स्वर्वेद के दोहों का पाठ कर ले, देखिए कितना परिवर्तन होता है | स्वर्वेद के दोहों में Sadguru की शक्ति कार्य करती है | हमारे अन्दर एक विशेष शक्ति का जागरण होता है | हमारे शरीर में कम्प होने लगता है | क्योंकि ये दोहे हैं, अनुभवसिद्ध और आप्त हैं | महान योगी के ह्रदय की वाणियाँ हैं | यह अमृत की अविछिन्न पीयूषधारा है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
जीवन मात्र भौतिक इन्द्रियों तक सीमित न रहे | हमारा जीवन आध्यात्मिक हो, फिर हम संसार के कार्यों को भी करें | अध्यात्म का अर्थ पलायन नहीं है | विहंगम योग का सन्देश यह नहीं है कि अपने कर्त्तव्यों का पालन न करो | जो भी सांसारिक कर्त्तव्य है उनका उचित रीति से पालन करो, लेकिन एक जो महान् कर्त्त्व्य है सर्वोत्कृष्ट कर्त्तव्य है, जो प्रधान कर्त्तव्य है उसके प्रति भी सचेष्ट हो जाओ |
नित्य प्रात:काल की धारणा आन्तरिक शन्ति का मार्ग प्रशस्त करती है | समस्त मनोविकारों से हमारी कार्य-क्षमता बढ़ जाती है | धारणा, ध्यान मात्र उन लोगों के लिए ही नहीं है, जो जीवन से विरत हैं, और चले गये हैं, हिमालय में, बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व की मानवता के लिए समान रुप से लाभकारी है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
हमारी वाणी उद्वेह को उत्पन्न करने वाली न हो, द्वेष को उत्पन्न करने वाली न हो | सत्य वाणी हो, प्रिय वाणी हो, हितकर वाणी हो | यह वाणी का तप है | वैदिक तथा आर्ष सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय वाणी का तप माना जाता है | स्वर्वेद का नियमित स्वाध्याय वाचक तप के अन्तर्गत है | स्वर्वेद के दोहों का पाठ वाणी शुद्धि की क्रिया है | वाणी का दुरुपयोग करने वाला स्वयं तो दु:ख पाता है और दूसरों को दु:ख बनाता है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
प्रत्येक योग साधक के लिए यह अनिवार्य है कि ध्यान करने से पूर्व स्वर्वेद के दोहों का पाठ कर ले, देखिए कितना परिवर्तन होता है | स्वर्वेद के दोहों में सद्गुरु की शक्ति कार्य करती है | हमारे अन्दर एक विशेष शक्ति का जागरण होता है | हमारे शरीर में कम्प होने लगता है | क्योंकि ये दोहे हैं, अनुभवसिद्ध और आप्त हैं | महान योगी के ह्रदय की वाणियाँ हैं | यह अमृत की अविछिन्न पीयूषधारा है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
मनुष्य अपनी मनुष्यता बचाए रखे, वह कितने ही बड़े कुल का क्यों न हो अगर उसकी प्रवृत्ति गलत है | अगर उसका आचार-विचार, व्यवहार ठीक नहीं है, तो वह पतन को प्राप्त होगा | अध्यात्म के क्षेत्र में उन्नति के लिए क्या चाहिए ? प्रेम चाहिए सद्भावना चाहिए, दया की भावना चाहिए, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्यचर्य और अपरिग्रह चाहिए । -संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
एक साधक जब विहंगम योग की क्रियात्मक साधना का अभ्यास करता है, तो उसके मस्तिष्क की तरंगें में परिवर्तन होता है | अल्फा होती हैं | उसके मस्तष्क में अल्फा, बीटा तरंगें कैसे प्रभावित हो रही हैं, शरीर में क्या परिवर्तन हो रहा है , श्वाँस की क्रियाओं में क्या परिवर्तन हो रहा है | आज अनेकों वैज्ञानिक विश्व के अनेक देशों में इस पर शोध कर रहे हैं |
कैसी भी स्थिति आने पर अन्त:करण में क्षोभ या विषाद को न आने देना, मुनियों के समान मन को संयमित रखकर कार्यों को करना, दुर्व्यवहार न करना, विहंगम योग की प्राथमिक साधना द्वारा मन को नियंत्रित करना, अन्तर्मुखी करना मानसिक तप है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज
प्रत्येक योग साधक के लिए यह अनिवार्य है कि ध्यान करने से पूर्व स्वर्वेद के दोहों का पाठ कर ले, देखिए कितना परिवर्तन होता है | स्वर्वेद के दोहों में सद्गुरु की शक्ति कार्य करती है | हमारे अन्दर एक विशेष शक्ति का जागरण होता है | हमारे शरीर में कम्प होने लगता है | क्योंकि ये दोहे हैं, अनुभवसिद्ध और आप्त हैं | महान योगी के ह्रदय की वाणियाँ हैं | यह अमृत की अविछिन्न पीयूषधारा है |
-संत प्रवर विज्ञान देव जी महाराज