जब स्वर्वेद का प्रकाशन नहीं हुआ था, तब सद्गुरुदेव इसकी पाण्डुलिपि को सदैव अपने पास रखते थे और भक्त-शिष्यों के मध्य स्वयं इसका गम्भीर स्वर में पाठ किया करते थे |यह ग्रन्थ उनके हृदय का प्रकाश है |स्वर्वेद का विषय अध्यात्म विद्या है, योगविद्या है और साथ ही साथ मानव जीवन के लिए समस्त पक्ष इसमें निहित है |यह अद्वितीय महान् सद् ग्रन्थ है |इसी के आधार पर हमें विहंगम योग के रथ को आगे बढ़ाना है |

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